Wednesday, 23 August 2017

गणेश चतुर्थी का वैज्ञानिक एवम लौकिक महत्व

गणेश चतुर्थी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार भारत के विभिन्न भागों में मनाया जाता है किन्तु महाराष्ट्र में बडी़ धूमधाम से मनाया जाता है। 
पुराणों के अनुसार इसी दिन गणेश का जन्म हुआ था।
गणेश चतुर्थी पर हिन्दू भगवान गणेशजी की पूजा की जाती है। कई प्रमुख जगहों पर भगवान गणेश की बड़ी प्रतिमा स्थापित की जाती है। इस प्रतिमा का नो दिन तक पूजन किया जाता है। बड़ी संख्या में आस पास के लोग दर्शन करने पहुँचते है। नो दिन बाद गाजे बाजे से श्री गणेश प्रतिमा को किसी तालाब इत्यादि जल में विसर्जित किया जाता है।

गणेशपुराण के मत से यह गणेशावतार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुआ था।
गण + पति = गणपति
संस्कृतकोशानुसार गणअर्थात पवित्रक 
पतिअर्थात स्वामी,
गणपतिअर्थात पवित्रकों के स्वामी

शिवपुराण के अन्तर्गत रुद्रसंहिता के चतुर्थ (कुमार) खण्ड में यह वर्णन है कि
माता पार्वती ने स्नान करने से पूर्व अपनी मैल से एक बालक को उत्पन्न करके उसे अपना द्वारपाल बना दिया शिवजी ने जब प्रवेश करना चाहा तब बालक ने उन्हें रोक दिया इस पर शिवगणों ने बालक से भयंकर युद्ध किया परंतु संग्राम में उसे कोई पराजित नहीं कर सका अन्ततोगत्वा भगवान शंकर ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से उस बालक का सर काट दिया इससे भगवती शिवा क्रुद्ध हो उठीं और उन्होंने प्रलय करने की ठान ली भयभीत देवताओंने देवर्षिनारद की सलाह पर जगदम्बा की स्तुति करके उन्हें शांत किया शिवजी के निर्देश पर विष्णुजी उत्तर दिशा में सबसे पहले मिले जीव (हाथी) का सिर काटकर ले आए मृत्युंजय रुद्र ने गज के उस मस्तक को बालक के धड पर रख कर उसे पुनर्जीवित कर दिया माता पार्वती ने हर्षातिरेक से उस गजमुख बालक को अपने हृदय से लगा लिया और देवताओं में अग्रणी होने का आशीर्वाद दिया ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्र पूज्यहोने का वरदान दिया भगवान शंकर ने बालक से कहा-गिरिजानन्दन ! विघ्न नाश करने में तेरा नाम सर्वोपरि होगा तू सबका पूज्य बनकर मेरे समस्त गणों का अध्यक्ष हो जा गणेश्वर ! तू भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को चंद्रमा के उदित होने पर उत्पन्न हुआ है इस तिथि में व्रत करने वाले के सभी विघ्नों का नाश हो जाएगा और उसे सब सिद्धियां प्राप्त होंगी कृष्णपक्ष की चतुर्थी की रात्रि में चंद्रोदय के समय गणेश तुम्हारी पूजा करने के पश्चात् व्रती चंद्रमा को र्घ्य देकर ब्राह्मण को मिष्ठान खिलाए तदोपरांत स्वयं भी मीठा भोजन करे वर्षपर्यन्त श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत करने वाले की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है


भाद्रपद-कृष्ण-चतुर्थी से प्रारंभ करके प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चंद्रोदयव्यापिनी चतुर्थी के दिन व्रत करने पर विघ्नेश्वर गणेश प्रसन्न होकर समस्त विघ्न और संकट दूर कर देते हैं
प्रत्येक शुक्ल पक्ष चतुर्थी को चन्द्र दर्शन के पश्चात्व्रती को आहार लेने का निर्देश है, इसके पूर्व नहीं किंतु भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को रात्रि में चन्द्र-दर्शन (चन्द्रमा देखने को) निषिद्ध किया गया है
गणेशोत्सव (गणेश + उत्सव) हिन्दुओं का एक उत्सव है। वैसे तो यह पूरे भारत में मनाया जाता है, किन्तु महाराष्ट्र का गणेशोत्सव विशेष रूप से प्रसिद्ध है  पेशवाओं ने गणेशोत्सव को बढ़ावा दिया । कहते हैं कि पुणे में कस्बा गणपति नाम से प्रसिद्ध गणपति की स्थपना शिवाजी महाराज की मां जीजाबाई ने की थी । परंतु लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणोत्सव को को जो स्वरूप दिया उससे गणेश राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बन गये । पूजा को सार्वजनिक महोत्सव का रूप देते समय उसे केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि आजादी की लड़ाई, छुआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने तथा आम आदमी का ज्ञानवर्धन करने का उसे जरिया बनाया और उसे एक आंदोलन का स्वरूप दिया इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया
गणेश जी को प्रथम लिपिकार माना जाता है उन्होंने ही देवताओं की प्रार्थना पर वेद व्यास जी द्वारा रचित महाभारत को लिपिबद्ध किया था । जैन एवं बौद्ध धर्मों में भी गणेश पूजा का विधान है। गणेश को हिन्दू संस्कृति में आदि देव भी माना गया है । अनंतकाल से अनेक नामों से गणेश दुख, भय, चिन्ता इत्यादि विघ्न के हरणकर्ता के रूप में पूजित होकर मानवों का संताप हरते रहे हैं । वर्तमान काल में स्वतंत्रता की रक्षा, राष्ट्रीय चेतना,  भावनात्मक एकता और अखंडता की रक्षा के लिए गणेशजी की पूजा और गणेश चतुर्थी के पर्व का उत्साह पूर्वक मनाने का अपना विशेष महत्व है  |


गणेश जी को यदि गणपति अर्थात किसी राज्य का राजा मान कर विश्लेषण किया जाए तो किसी शासक के अच्छे लक्षण स्पष्ट दिखाई देने लगेंगे । 
गणेश जी गज मस्तक हैं अर्थात वह बुद्धि के देवता हैं । वे विवेकशील हैं । उनकी स्मरण शक्ति अत्यन्त कुशाग्र है । 
हाथी की भ्रांति उनकी प्रवृत्ति प्रेरणा का उद्गम स्थान धीर, गंभीर, शांत और स्थिर चेतना में है । 
हाथी की आंखें अपेक्षाकृत बहुत छोटी होती हैं और उन आँखों के भावों को समझ पाना बहुत कठिन होता है। शासक भी वही सफल होता है जिसके मनोभावों को पढ़ा और समझा न जा सके । आंखों के माध्यम से मन के भावों को समझना सुगम होता है । यदि शासक की आँखें छोटी होंगी तो उसके भावों को जान पाना उतना ही कठिन होगा । इस प्रकार अच्छा शासक वही होता है जो दूसरों के मन को तो अच्छी तरह से पढ़ ले परन्तु उसके मन को कोई न समझ सके
गज मुख पर कान भी इस बात के प्रतीक हैं कि शासक जनता की बात को सुनने के लिए कान सदैव खुले रखें । यदि शासक जनता की ओर से अपने कान बंद कर लेगा तो वह कभी सफल नहीं हो सकेगा । 
शासक को हाथी की ही भांति शक्तिशाली एवं स्वाभिमानी होना चाहिए अपने एवं परिवार के पोषण के लिए शासक को न तो किसी पर निर्भर रहना चाहिए और न ही उसकी आय के स्रोत ज्ञात होने चाहिए। 
हाथी बिना झुके ही अपनी सूँड की सहायता से सब कुछ उठा कर अपना पोषण कर सकता है। शासक को किसी भी परिस्थिति में दूसरों के सामने झुकना नहीं चाहिए। 
गणेश जी को शुद्ध घी, गुड और गेहूँ के लड्डू बहुत प्रिय हैं। इसीलिए उन्हें मोदक प्रिय कहा जाता है। ये तीनों चीज़ें सात्विक एवं स्निग्ध हैं अर्थात उत्तम आहार हैं। सात्विक आहार बुद्धि में स्थिरता लाता है। उनका उदर बहुत लम्बा है। उसमें हर बात समा जाती है। शासक में हर बात का रहस्य बनाए रखने की क्षमता होनी चाहिए।
गणेश जी सात्विक देवता हैं उनके पैर छोटे हैं जो कर्मेन्द्रिय के सूचक हैं।
पैर जो गुण के प्रतीक हैं जो शरीर के ऊपरी भाग, जो सत्व गुणों का प्रतीक है, के अधीन रहने चाहिए।
चूहा उनका वाहन है। चूहा बहुत चंचल और बिना बात हानि करने वाला है। चूहा किसी बात की परवाह किए बिना किसी भी वस्तु को काट कर नष्ट कर सकता है। इसी प्रकार कुतर्क बुद्धि भी मन के सात्विक भाव को खंडित करने का प्रयास करती है। यह मानव के राग-द्वेष आदि मानसिक गुणों से भरे मन का प्रतीक है। चूहे जैसे चंचल मन पर बुद्दि की भारी शिला रखनी आवश्यक है। वश में रह कर ही अमंगलकारी तत्त्व को मंगलमय वाहन अथवा साधन बनाया जा सकता है।
गणेश जी की चार भुजाएँ चार प्रकार के भक्तों, चार प्रकार की सृष्टि, और चार पुरुषार्थों का ज्ञान कराती है। 
हाथों में धारण अस्त्रों में पाश राग का; अंकुश क्रोध का संकेत है। वरदहस्त कामनाओं की पूर्ति तथा अभय हस्त सम्पूर्ण सुरक्षा का सूचक है।
उनके सूप-कर्ण होने का अर्थ कि वह अज्ञान की अवांछित धूल को उड़ाकर उन्हें ज्ञान दान देते हैं। माया को हटाकर ब्रह्म का साक्षात्कार कराते हैं।
नाग का यज्ञोपवीत कुंडलिनी का संकेत है।
शीश पर धारण चन्द्रमा अमृत का प्रतीक है।

फिर भी गणेश चतुर्थी को चन्द्रमा के दर्शन करना वर्जित कहा गया है। इस संदर्भ में एक पौराणिक आख्यान इस प्रकार है कि-एक बार गणेश जी अपने मूषक पर सवार होकर ब्रह्मलोक से चन्द्र-लोक होते हुए मर्त्यलोक आ रहे थे। उनके स्थूलकाय शरीर, गजमुख, मूषक वाहन इत्यादि की विचित्रताओं को देख कर चन्द्रमा हंस पड़े। उस हँसी के कारण गणेश जी क्रोधित हो उठे और उन्होंने चन्द्रमा को शाप दे दिया कि गणेश चतुर्थी को चन्द्र-दर्शन करने वाले को कलंक लगेगा। इसी कारण स्वयं भगवान श्री कृष्ण पर मणि चुराने का कलंक लगा था।


JAY SHREE GANESH 

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